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दौर बदल रहा है।

डॅलर की धौस अब, पस्त होने लगी । 
अमरीकी बपौतियाँ, मस्त होने लगी ।।
रूस फिरसे जाग उठा है, सोवियत की चाह में। 
अपने भी कदम बढ़ चले है, दगवीजय की राह में।

देश ३३ कर चुके है रूपए पर भरोसा 
पिज़ा बर्गेर से पसंद , उनको अब समोसा 
६० देश और खड़े पांगती बद्ध, कब मिले मौका ?
ताकतवर मुल्कों  ने मिलके, अब तलक जिनको रोका !

विश्वगुरु ही नहीं, जगत सेठ भी हम होंगे !
महेंगाइ से त्रस्त सभी, दाम जाने कब काम होंगे ?
डॉलर और मिटटी तेल से मुक्ति, बस  एक मार्ग शेष। 
मार्ग ये सुगम नहीं , प्राच्य पर लाएगा पश्चिम कुछ तो क्लेश !

अर्थ के अनर्थ को थामने, सैन्य शक्ति का प्रयोग भी संभव !
आत्मनिर्भरता से करना है स्वयं के शक्ति का उद्भव !!
भारत के विभाजित क्षेत्र सारे विलय को आतुर आज !
राष्ट्रहित को विवेकवान, सत्ता की युक्ति चातुर आज !!

राष्ट्र सनातन अपनीओज की खोज में लगा है 
और युवा अश्लीलता के बोझ से लदा है !!
इस दलदल से भी खींच कर लाने का समय आ गया हैं !
दौर बदल रहा है , अब स्वयं को पाने का का समय आ गया है !!

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युद्ध घोष

नूह, नागपुर, मुर्शिदाबाद, पुलवामा हो या पहलगाम ! कुछ अंतर नहीं है इनमे,  सब अल जिहाद के घाव तमाम !! भत्सनाओं का समय निकल गया, अबतो शुरू करो इनको मिटाना ! और इनके जो है सारे सहकारी बुलडोज़र तले हो इनका ठिकाना !!  विक्सित भारत है स्वप्न तुम्हारा गज़वा -ए - हिन्द उनको चाहिए ! सिमी, प.फ.आई , आई. एम बनाने  मिलते है कहाँ से जो लोग चाहिए ?  वो जो है, उनको वही कहना सीखो मिमयाना छोडो, अब शेर बनकर जीना है।   अल जिहाद से युद्ध की हो चुकी घोषणा अब भिड़ाकर देखेंगे बारूदों से फौलादी सीना !! जन्नत के परवानो से लड़ना है तुमको जानो, इस युद्ध के है आयाम कई! शोणित से लाल होगी गलियां सभी चुकाने पड़ेंगे हमको भी दाम कई ! इस युद्ध को परिणाम देने, जिहाद के निर्गत तक जाना होगा ! संक्रमन सफाई प्रयाप्त नहीं, उद्गम तक जाकर, समाधान का अभियंता बन जाना होगा।  अब इस रण में, जो भी विघ्न बनेगा गांडीव से शर उस ओर भी जाएगा। गंगा-जमुनी तहजीब का चूरन, जिसने अब चखाया, वो पछताएगा।   

Flaud Teri Shiksha Neeti

कहां आर्यभट्ट, कहां ऋषी कणाद ? कहां ब्रम्हगुप्त, कहां मुनी अगस्त? ग्रैजुएट, मास्टरस कितने पढ़े लिखे एक मैथ्स की प्रौबलेम, सबको दस्त!  ज़िरो दिया हमने, दिया दशम्ळव, लगे रट्टा मार, मरे साईंस का लव! त्रीकोणमिती देने वाले, थीटा पाई से डर गए! लगा कैलकुलेटर हाथ, बंदे बिगड़ गए!! फ्लौड (3) , तेरी शिक्षा नीती !  कहीं अच्छी थी अपनी, दिक्षा नीती !! परमार का पता है, न मुक्तपीड़ का पता!  शुश, पता न चले सोहेलदेव की कथा !! भर भर के झूठ, ईतीहास के नाम परोसते रऔ!  लालची लुटेरे पुर्वज सोच सोच कोसते रऔ ! विद्या ददाती विनयम् , विनए ददाती  पात्रताम् ! पंद्रह से सत्रह साल की पढ़ाई, मै निकला बेशरम !! 190 साल की लड़ाई, कोट पैंट टाई में गवाई ! संघर्ष ६१० साल का निरंतर, हमको नहीं पढाई ?  फ्लौड (3) , तेरी शिक्षा नीती !  कहीं अच्छी थी अपनी, दिक्षा नीती !! १२ साल की स्कूलिंग, ५ साल की इंजीनियरिंग हम सब सारे हुक्म के गुलाम, बजट फेयरिंग !!  

द्विचर

दो नाव पर पांव डार जलधी पार जाने का विचार उसपर उल्टे पतवार, मूर्खता कहलाती है । हमको इसकी सलाह क्यों दी जाती है ?  क्यारियों में अलग अलग फूल, अच्छे है। बीच में कुछ शूल भरे खार पतवार के गुच्छे है। इनको अगर मैं उखाड़ दूं, ग़लत क्या है ? आखिर, वन और उपवन में भेद से गफलत क्या है? आलोक का ना होना ही तो तम है  इनमें समन्वय होना बस एक भ्रम है, इस भ्रम को जीवन शैली का आधार बनाना अराजकता की ओर धकेलने का है बहाना !!  समय भस्म के कब्रों में कर्म छुपा ना पाओगे। अपने अक्स से सामना होगा, शर्म छुपा ना पाओगे !! ये वैश्विक होने का , टूट चुका है भंगुर ताशघर  । अपनी चाल भूल चुके, नकल उतार तुम बने द्विचर !!