मंगलवार, 21 जून 2022

कौन सही ? या मौन सही !


गूजर के राज का तेली,
भोज सिंहासन जा बैठा!!
जो मानस में जागे, वही ठीक! 
अपने ज़िद पर निर-अंकुश ऐठा!!

वैश्य वर्ण के चरण राज सत्ता! 
अर्थ धर्म को गौण कर रहा!! 
आरक्षण सुसज्जित, योग्यता पर बट्टा! 
क्षत्रीय रक्त शीतल,  मौन भर रहा!! 

सम्वेदनाए मगर के अश्रू हुए! 
राष्ट्र सारा बाज़ार कर दिया!! 
चंद गूजर के वैशयों का शासन! 
अर्थव्यवस्था का आधार कर दिया!!  

एक राज्य के अधीनस्त बाकी सारे 
गणतंत्र में साम्राज्यवाद का नया दौर हो गया!!  
हम गृहस्त के कार्यों में उलझे रहे। 
यहाँ राजनीती, अलीगढ से मंदसौर हो गया!! 

पालघर से लखीमपुर तक भटकता बलिदान यहाँ 
बाग़ कहीं शाहीन हुआ, कब्ज़ाबाज़ किसान हो गया। 
कश्मीर भी फिर बना बिहारियों का शमशान वहाँ। 
हिन्दू को बपौती समझ, चौकीदार बेईमान हो गया।

 विकल्प खोजते बन नहीं पड़ता,  न सूझे कौन सही।
 बस अपनो पे चलता है ज़ोर, दोश हमारे गौण सही। 
ध्वनी विरोध की न उपजे, अभिव्यक्ती मौन सही। 
समए हमसे पूछता, पूछें कौन सही, या मौन सही ! 


शनिवार, 21 मई 2022

हिन्द की रूह !

जिस तरह डूबता हुआ सूरज
आसमाँ में लालीमा भर देता है।
बुझता हुआ दीपक भी, अपनी
आभा से घर रौशन कर देता है।  

ठीक उसी तरह टूटने से पहले
जाग उठती है हिन्द की रूह !
हर आवाज़ नारो में तबदील अब। 
हर तरफ लोगों का हुजूम, शामिल सब। 

ज्यों ज्यों झूठ का नकाब हटता है
उमीदें टूटती है, ऐतबार घटता है। 
और लोगो का गुस्सा सैलाब बनता है 
मज़लूमो का जुर्मवालों पे हिसाब बनता है। 

दिशा न दी गई, तो ये ताक़त ज़हर है। 
हर किसी पे ये अज़ाब, कहर है।
इस भट्टी में तप कर ही निखारना होगा। 
अंकुरित होना है ? बीज बन बिखरना होगा।  

वक़्त ऐसे ही दौर से गुज़र कर बदलता है। 
कुछ नया बनने से पहले , हर शय  जलता है। 
टूटते है ऊँचे  दरख़्त, तिनको से चमन बनता है।  
जैसे हर बार टूटता है हिन्द, फिर नया वतन बनता है।


बुधवार, 16 मार्च 2022

90 और तुम्हारे पाप

बाॅलीवूडी इश्क मुहौब्बत
क्रीकेट बुखार से मीडीया भरदी थी।
तुमने रखी आँखे चकाचौंध, रहमत।
काशमीरी झुलसती आहें, नज़रअंदाज़ करदी थीं?

रलिफ, चलिफ,गलिफ के नारे
मसजिदों से गूँजते, वो तड़पते सुनते रहे । 
और हम बेख़बर से, बाखुशी के मारे
अपने (2) पसंदीदा ख़ान चुनते रहे । 

साल गुज़र गए दो करीब
सुद ली ना थी अबतक किसी ने
याद आए भी तो नवाज़-ए-गरीब,
बाबरी क्या गिरी, मुसलमाँ आज भी पीटते सीने ।

ये 90 का दर्द, हर 19 जनवरी
दूना होता चला गया, ऊमीदें सर पटकती रही। 
कभी माचिस जलाया, कभी मनाई 14 फरवरी। 
अनसुनी चींखें, दील्ली में भटकती रही ।  

हूरो के दर पे दस्तक को
हूरीयत, काशमीर में उबालती रही।
फारूख, ग़ुलाम, मुफ्ती महबूबा सब को,
भारत की गरीब जनता पालती रही ।।

90 के दशक से आज तक
किसी की चुप्पी, कीसी का झूठ। 
अन्नतनाग से, इस्लामाबाद तक, 
तुम्हारे पाप के सिलसिले अटूट । 


शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

टेम आ गया है।

खुद को जानने का,
दुविधा को हटाकर
भ्रांतिया सब घटाकर
सत्य को मान्ने का 

" टेम  आ गया है। "


                                                                            जिन पर हम हसते रहे
                                                                           हरबार उन्ही बातों से
                                                                           तिरस्कृत जज़्बातों से 
                                                                           घरशत्रु  हमे डसते रहे

                                                                           पर अब,  टेम  आ गया है। 

विदेशों में सम्मान मिले 
वो सनातन को चाहे 
हम माने गहे बगाहे।
उसपर भी फरमान मिले। 

अब नहीं,  टेम  आ गया है। 


                                                                           भगवाकरण ? है, तो है। 
                                                                           वेदो से सीख, आचरण 
                                                                           धर्म हेतु मृत्यु का  वरण 
                                                                           कम्युनल ? है, तो है। 

                                                                            टेम  आ गया है। 


शनिवार, 29 अगस्त 2020

वोकल फॉर लोकल

मेरे गांव का नंदू नाई
अच्छे बाल बनाता है।
श्राद्ध संस्कार और मुंडन सर्विस
स्पेसल डिस्काउंट दिलाता है। 

नंदू की बीवी गौरा भी
घर घर ब्यूटी पार्लर चलती है।
फेसिअल और घुंगराले बाल
आपके घर जाके कर आती है।

क्या कहा ? इसमें मेरा क्या फायदा ?
कमीशन एजेंट नहीं हूँ , बात कुछ और है।
अच्छे पडोसी होने का फ़र्ज़ है ये,
आजकल वोकल  फॉर लोकल का दौर है। 

बड़े उद्योगपति सब बोहोत कमा चुके
कोसना छोड़ो , कर्म करने का तौर है।
सपने देना उनका काम, पूरा करना हमारा
समझलो जबतक मोदीजी सिरमौर है।

सोमवार, 24 अगस्त 2020

आत्मनिर्भर

 गुप्त अँधेरे कमरे से
कब तक बाहर ताकोगे ?
उजालों के लिए कब तक ,
बंद खिड़कियों से झांकोगे ? 

आज चीन से तनी है ,
तो उसका बसहिष्कार सही।
स्वदेशी की सोच, देर करदी
शायद? फिर भी विचार सही। 

कल फिर किसीसे तनेगी,
बहिष्कार का वो वजह देगा।
आत्मविश्वास अंगद सा न हुआ,
तो इतिहास उसकी सजा देगा।

हो सकता है जुमला हो,
ये भी देश के चौकीदार का !
खून तुम्हारा भी अगर शामिल है ?
तो फ़र्ज़ निभाओ हक़दार का।  

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

गीता सार सुनो

द्वापर के अंत सा, समय सर्प फुंकार रहा।
कुरुक्षेत्र सा सज्जित लेह, रण को ललकार रहा।।
फिर से रख गांडीव, दुविधा से ग्रस्त ना होना।
इस बार खलेगा, तूणीर में दिव्यास्त्रों का ना होना।।

होंगे ऐसे भी चार्वाक जो, अहिंसा परमोधर्म: कहेंगे।
शत्रु के मुखपार्त्र बन, कुछ तो जेब अपनी गर्म करेंगे।।
क्षत्रिय धर्म पुकारे, जनहित के उचित  कार्य करो।
मनुज जीवन पर संकट है, धर्मयुद्ध जा आर्य लड़ो।।

राष्ट्रों के बीच की सीमारेखा, विवाद बहुत छोटा है !
जो है प्रतिपक्ष, वो मानवता के इतिहास मे खोटा है !!
इस बार परीनाम का न सोचो, उद्देश्य आधार चुनो! 
धर्मो धर्मे रक्षित:!,  आततायी का प्रतीकार चुनो!!