दो वक़्त की सब्जी रोटी! सर छुपाने को छद छोटी! ओर सुरक्षा की जिम्मेदारी इतना ही पड़ना था भारी!! वसुधा से कौटुंभ निभाने गुटों से विरत रहने की ठाने !! झुके पीठ ओर सिकुड़ा सीना। कभी वंचित, कभी अनुग्रहित हो जीना। संकल्पों को धीरज का बल अपना एक मात्र था संबल जब जब जग ने दिया तिरस्कार। हमने भी चूनौतियां, की स्वीकार।। भूखमरी से बचने को घांस खाए सोमवार के उपवास से अन्न बचाए खेतों में शोणित बोकर क्रांति हरि करदी! मुफ्त पाने अन्न ८० करोड़, शक्ति बड़ी करदी!!
ग़ौरी के जीतते ही बदल गई, दिल्ली छोड़ पूरा भारत निगल गई। प्रतिहार, मालवा, चोल, मगध, बंगाल सारे कपूर से ऊब गए, या हुए कंगाल सारे? मुहल्ले के सुल्तान, नाम से गए पहचाने सम्राटों का कारवां, छोटा इस बहाने? छाप, तिलक सब सूफियों ने छीना हाकिमों ने लूटा, हासिल - ए - पसीना !! अपनो से लुटा, आया छोड़कर फ़र्गना लुटेरों की सामान का एक सरगना। उसके वंशजों को जगह मिली खास हमारे कृष्ण, राम सब कहलाए बकवास!! अरुणाचल से त्रिपुरा तक से सब अंजान है बस दिल्ली से जो हारा लड़कर, उसकी ही पहचान है। ताज के संग - ए - मरमर में दफ्न जितनी चीख है। पूछती है हमसे, ये किसकी तारीख है?