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दूब की जड़ें

सुना है, अमृत कलश तक
पहुंचती हैं दूब की जड़ें।
तभी तो उखड़ते है पेड़ अंदर में,
ये तृण कुल रह जाते खड़े। 

माटी की दरारें बनती है रास्ता,
भूकंप लाए जब, आपस में जा लड़े।
सहचर है प्रकृति के सब अवयव।
एक हम ही एकरूपता के पीछे पड़े। 

दरारें समाज में भी कम नहीं
अपने अहं पर रहे सब अड़े।
क्लेश के कारण भींकम नहीं,
किस किस मुद्दे पे हम न लड़े ।

इन दारानों का नफा उठा रहा कोई
चाह रहे कई, हम उलझनों में रहे पड़े ।
वो नहीं चाहते, गौरव का संचार हो हम्मे,
ना ही हमें मिले, पोषण देती जड़ें। 

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Flaud Teri Shiksha Neeti

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द्विचर

दो नाव पर पांव डार जलधी पार जाने का विचार उसपर उल्टे पतवार, मूर्खता कहलाती है । हमको इसकी सलाह क्यों दी जाती है ?  क्यारियों में अलग अलग फूल, अच्छे है। बीच में कुछ शूल भरे खार पतवार के गुच्छे है। इनको अगर मैं उखाड़ दूं, ग़लत क्या है ? आखिर, वन और उपवन में भेद से गफलत क्या है? आलोक का ना होना ही तो तम है  इनमें समन्वय होना बस एक भ्रम है, इस भ्रम को जीवन शैली का आधार बनाना अराजकता की ओर धकेलने का है बहाना !!  समय भस्म के कब्रों में कर्म छुपा ना पाओगे। अपने अक्स से सामना होगा, शर्म छुपा ना पाओगे !! ये वैश्विक होने का , टूट चुका है भंगुर ताशघर  । अपनी चाल भूल चुके, नकल उतार तुम बने द्विचर !!