सुना है, अमृत कलश तक
पहुंचती हैं दूब की जड़ें।
तभी तो उखड़ते है पेड़ अंधर में,
ये तृण कुल रह जाते खड़े।
माटी की दरारें बनती है रास्ता,
भूकंप लाए जब, आपस में जा लड़े।
सहचर है प्रकृति के सब अवयव।
एक हम ही एकरूपता के पीछे पड़े।
दरारें समाज में भी कम नहीं
अपने अहं पर रहे सब अड़े।
क्लेश के कारण भी कम नहीं,
किस किस मुद्दे पे हम न लड़े ।
इन दारानों का नफा उठा रहा कोई
चाह रहे कई, हम उलझनों में रहे पड़े ।
वो नहीं चाहते, गौरव का संचार हो हम्मे,
ना ही हमें मिले, पोषण देती जड़ें।
यूँ तो पुष्पों का खिलना माधुर्य देता है
परन्तु , तृणकुल में ये शोक का करक है।
समूल नष्ट होने का संकेत देता है
जो तोड़ दे इस कलि को, उद्धारक है।
समूल नष्ट होने का संकेत देता है
जो तोड़ दे इस कलि को, उद्धारक है।
जनमानस हो तुम दूब से, तृणों के भांति
ऊंचे दरख्तों से प्रेरित हो भटक न जाना,
जड़ों से अमृत प्राप्ति ही है ख्याति।
ऊंचे दरख्तों से प्रेरित हो भटक न जाना,
जड़ों से अमृत प्राप्ति ही है ख्याति।
अपनी जड़ें खोकर त्रिशंकु सा लटक ना जाना।
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