सुना है, अमृत कलश तक
पहुंचती हैं दूब की जड़ें।
तभी तो उखड़ते है पेड़ अंदर में,
ये तृण कुल रह जाते खड़े।
माटी की दरारें बनती है रास्ता,
भूकंप लाए जब, आपस में जा लड़े।
सहचर है प्रकृति के सब अवयव।
एक हम ही एकरूपता के पीछे पड़े।
दरारें समाज में भी कम नहीं
अपने अहं पर रहे सब अड़े।
क्लेश के कारण भींकम नहीं,
किस किस मुद्दे पे हम न लड़े ।
इन दारानों का नफा उठा रहा कोई
चाह रहे कई, हम उलझनों में रहे पड़े ।
वो नहीं चाहते, गौरव का संचार हो हम्मे,
ना ही हमें मिले, पोषण देती जड़ें।
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