ग़ौरी के जीतते ही बदल गई,
दिल्ली छोड़ पूरा भारत निगल गई।
प्रतिहार, मालवा, चोल, मगध, बंगाल सारे
कपूर से ऊब गए, या हुए कंगाल सारे?
मुहल्ले के सुल्तान, नाम से गए पहचाने
सम्राटों का कारवां, छोटा इस बहाने?
छाप, तिलक सब सूफियों ने छीना
हाकिमों ने लूटा, हासिल - ए - पसीना !!
अपनो से लुटा, आया छोड़कर फ़र्गना
लुटेरों की सामान का एक सरगना।
उसके वंशजों को जगह मिली खास
हमारे कृष्ण, राम सब कहलाए बकवास!!
अरुणाचल से त्रिपुरा तक से सब अंजान है
बस दिल्ली से जो हारा लड़कर, उसकी ही पहचान है।
ताज के संग - ए - मरमर में दफ्न जितनी चीख है।
पूछती है हमसे, ये किसकी तारीख है?
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें