व्यापकता की ओर

दो वक़्त की सब्जी रोटी!
सर छुपाने को छद छोटी! 
ओर सुरक्षा की जिम्मेदारी
इतना ही पड़ना था भारी!! 

वसुधा से कौटुंभ निभाने
गुटों से विरत रहने की ठाने !!
झुके पीठ ओर सिकुड़ा सीना। 
कभी वंचित, कभी अनुग्रहित हो जीना। 

संकल्पों को धीरज का बल
अपना एक मात्र था संबल
जब जब जग ने दिया तिरस्कार।
हमने भी चूनौतियां, की स्वीकार।।

भूखमरी से बचने को घांस खाए
सोमवार के उपवास से अन्न बचाए
खेतों में शोणित बोकर क्रांति हरि करदी! 
मुफ्त पाने अन्न ८० करोड़, शक्ति बड़ी करदी!! 

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