परिवर्तन या परंपरा

ये जो परिवर्तन परिदृस्ट हो रहा है ,
फिर बंगाल चेतना से बलिष्ट हो रहा है। 
मानो श्रापग्रत हुए हनुमान सा पड़ा था, 
किसी मोड़ पर जाबुवन्त मिले, इंतज़ार में खड़ा था।

वरना, हर दबाव से निखारना  चरित्र है हमारा, 
इतिहास में स्वणाक्षर से वर्णित है सारा। 
यहाँ माताएं, स्तनों से विद्रोह पिलाती है
बैसाख के झंझावात, संघर्ष सिखाती है। 

सच है, पिछले सदी से बेगाने हाकीमों ने पाला, 
ग्लानि की राख ने छुपाली, आत्मसम्मान की ज्वाला। 
उनके ख़ज़ानों को भरने का माध्यम बनते रहे, 
खुद कुपोषित, पेट बांध कर चलते रहे।  

पर इसमें भी सुलगती चिंगारियां निकलती रही।  
घनघोर अंधेरों में, आशा दिया बनके जलती रही।
हिसाब लिया गया कंपनीवालों से कटे अंगूठों का
राजधानी उखाड़ फेका, लाल रंगरूटों का।  

नील की खेती ने आकाल दिया,भूखमरी से मारा,
सन्यासियों ने विद्रोह को शास्त्रों से शस्त्रों में उतारा। 
जनजातियों में चेतना का संचार किया हमने। 
बिरसा मुंडा बनके, विधर्मियों पे प्रहार किया हमने। 

कर्ज़न ने सोचा बाटकर हमको कमज़ोर करेगा
उसे क्या पता था, गलती  वो घनघोर करेगा।  
जो चुचाप था घरों में अबतक, सड़कों पे आ गया । 
जंगलों की क्रांति, अब कलकत्ता में छ गया।

सन ४६ में हमको, पीठ पे खंजरों का दौर मिला 
गले लगाया था जिनको, दुश्मन के तौर मिला। 
मिले मीठे थपकियों से सुलाने वाले भी कम नहीं। 
मेरे लहू को मलकर, मरहम कहने वाले कम नहीं।

ये सिलसिला चला है एक लम्बे अरसों तक। 
श्राप निद्रा में जैसे डूबा हुआ बंगाल बरसों तक।
आज जो विस्मित करता है, वो नई अंगड़ाई नहीं है,
हमने विद्रोह की परंपरा निभाई नहीं, पर भुलाई नहीं है।  
 

  

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