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आखिर घंटी बांधेगा कौन?


एक कहानी बड़ी पुरानी
सुनाया करती थी मेरी नानी
" बिल्ली मौसी आया करती
रोज़ चूहे खाया करती "।

चूहों ने था मिलकर सोचा
मिलकर एक उपाए खोजा ।
बिल्ली के गले में डालेंगे घंटी,
"पर कौन डालेगा?" पूछ बैठा बंटी !

नानी बोली चूहे थे ऊपर से डेट,
पर थे वे अन्दर से बटे ।
प्रश्न यही जब सदर ने उठाया,
एक ने भी ना कदम बढाया ।

बिल्ली मौसी लेती सपनो की झकीं ,
चूहे करते रहे ताका-झाकी ।
बिल्ली मौसी सोये से जगी
फिर चूहों के पीछे भागी ।


आज हम बन बैठे चूहे !
और हालात है बिल्ली ।
हमे पता है, क्यों हारे चूहे,
क्यों जीत गई बिल्ली ।

आज हालात और बुरी है ,
घंटी बांधने की अपनी घडी है ।
जब प्रश्न उठे , बांधेगा कौन ?
तुम आगे बढ़ो रहो ना मौन !

हम इंसान है , चूहे नहीं !
डरकर छुपे हुए नहीं ! !
हम शसक्त है, प्रबल है !
उन्मुक्त है, स्वतंत्र है ! !

हम चूहे ना सही,
 हालात है बिल्लियाँ !
रोष से उठे, बदलें इसे,
 उड़ाए इसकी खिल्लियाँ ! !

हम निडर है, हम अनार है !
नाम से और काम से !
सहस पूर्ण कम है,
बड़ा तीर्थ चारों धाम से ! !

हमे सहस के साथ ही
काम आगे भी करते जाना!
सीख हमको दे गयी नानी, होकर चंद चूहे भी,
बिल्लियों से लड़ते जाना ! !

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