सोमवार, 28 मई 2012

मेरी क्षमता, मेरा व्रत!

 क्या बस इतना ही कर पाउँगा?
आईने में चहरा दिखाकर चला जाऊंगा !
वो अपनी बदसूरती से कब तक मुह छुपायेगा ?
एक दिन आइना कोई काम  आएगा !

आखिर जबजानते सब!
क्या और किसको दिखाने चला हूँ ?
जिसे देखकर करते लोग अनदेखा
मै बेकार में इन अंधों को बताने चला हूँ?

सब के सब जानकार
फिर भी निष्क्रिय बैठे है !!
ये अज्ञान नहीं राष्ट्रद्रोह है !
जो मुद्रा की शक्ल में, अरमां ऐठे है!!

सच है, मै मूक दर्शक नहीं हूँ !
कोई देख कर संतुष्ट हो , आकर्षक नहीं हूँ !!
जिनमे चाहा चेतना , वे सभी निर्जीव यहाँ !
गर्जना पर-वेदना पर , क्या अब  निरर्थक नहीं है ?!


स्वयं का धर्मयुध्य लड़ना ना चाहे !
युध्य की बीज दूसरों के कुरुक्षेत्र में बोई  !!
इराक क्यों जला?, क्यों यूरोप में मंदी छाई , मुद्दे है !
बच्चे बेच कर जिंदा है, समाचार में अधिकारक्षेत्र  ना कोई !! 

मै कवी हूँ सामने आइना न बस धर  सकता हूँ !
प्रतिबिम्ब समाज को दिखा सकता हूँ !!
मै दे सकता हूँ , थोड़ी सी प्रेरणा, कर सकता उत्साहित!
कर सकता हूँ मार्गदर्शन भी, चलना भी सिखा सकता हूँ !!

परन्तु मेरे हर प्रयास की सफलता
तुमपे जा, बन जाती असफलता !!
तुम जब नकार देते हो , मुझे ही नहीं !
खुद अपने प्रतिबिम्ब को भी, होती मेरी विफलता !!

फिर भी मै निरंतर प्रयासरत हूँ!
स्तिथि तुम्हारी सुधरे मै निष्ठ व्रत हूँ !
जब तक मै प्रयासरत हूँ, मै सफल हूँ !
चलना होगा मुझे जब तक न मै नि:व्रत हूँ!




सोमवार, 14 मई 2012

भारत का प्राचीन गणतंत्र

हम  सभी  जानते   हैं   पिछले  ८०००  सालों से  भारतवर्ष  एक  राजतान्त्रिक देश  रहा  है । पुराणों  के  अनुसार  सत्य युग  से  ही  प्रजापालक  या  चक्रवर्ति सम्राट  ही  राज   किया करते  थे। समय के साथ भारतवर्ष का नक्षा बदलता रहा, ये भूखंड कभी एक देश नहीं रहा, छोटे छोटे साम्राज्यों में विभाजित था, पर इन्हें बंधती थी इनकी धार्मिक विशवास! देश में गुरुकुल और आश्रम बिना किसी साम्राज्य सीमा के अधीन आये स्वतंत्र  ही रहते थे, गुरु सबके पूजनीय थे, गुरुकुल और गुरु ही राजा के स्वार्थ पर अंकुश लगते थे !

समय बदलता गया, राजा गुरुकुल की अवहेलना करने लगे, गुरुकुलों ने राजवंशों को शिक्षा देने से मना करने लगे । विवेकवान राजाओं ने गुरुकुलों से संधि की । एक व्यवस्था बनी, गुरुकुल करने लगी मंत्री सामंतों का चयन योग्यता के मापदंड से|
 चूँकि, गुरुकुल के आचार्य समाज के उच्चवर्ण से उठकर आये लोगो का समूह था | मोर्य काल एवं गुप्त काल के आते आते वैदिक विचार धरा को त्याग कर, शाशकों ने बोउध्य धर्म को अपना लिया था |  इस व्यवस्था से दुसरे वर्ण के जाती के धर्म के लोग जुड़ते चले गए । और ये समूह समाज के शिक्षित वर्ग का समूह बन गया।

अब जहाँ देश के अन्दर विद्यमान हर राज्य के मंत्रिमंडल को देश का शिक्षित वर्ग चुनने लगे उसे आप गणतंत्र कहेंगे या राजतन्त्र ?  वर्तमान में जिस गणतंत्र इ हम है क्या वो गणतंत्र हमारे इस प्राचीन गणतंत्र से बेहतर है? या हम किसी अव्यवस्था में फसें हुए है, और गणतांत्रिक देश होने का भरम पाल रहें है !?

आखिर घंटी बांधेगा कौन?


एक कहानी बड़ी पुरानी
सुनाया करती थी मेरी नानी
" बिल्ली मौसी आया करती
रोज़ चूहे खाया करती "।

चूहों ने था मिलकर सोचा
मिलकर एक उपाए खोजा ।
बिल्ली के गले में डालेंगे घंटी,
"पर कौन डालेगा?" पूछ बैठा बंटी !

नानी बोली चूहे थे ऊपर से डेट,
पर थे वे अन्दर से बटे ।
प्रश्न यही जब सदर ने उठाया,
एक ने भी ना कदम बढाया ।

बिल्ली मौसी लेती सपनो की झकीं ,
चूहे करते रहे ताका-झाकी ।
बिल्ली मौसी सोये से जगी
फिर चूहों के पीछे भागी ।


आज हम बन बैठे चूहे !
और हालात है बिल्ली ।
हमे पता है, क्यों हारे चूहे,
क्यों जीत गई बिल्ली ।

आज हालात और बुरी है ,
घंटी बांधने की अपनी घडी है ।
जब प्रश्न उठे , बांधेगा कौन ?
तुम आगे बढ़ो रहो ना मौन !

हम इंसान है , चूहे नहीं !
डरकर छुपे हुए नहीं ! !
हम शसक्त है, प्रबल है !
उन्मुक्त है, स्वतंत्र है ! !

हम चूहे ना सही,
 हालात है बिल्लियाँ !
रोष से उठे, बदलें इसे,
 उड़ाए इसकी खिल्लियाँ ! !

हम निडर है, हम अनार है !
नाम से और काम से !
सहस पूर्ण कम है,
बड़ा तीर्थ चारों धाम से ! !

हमे सहस के साथ ही
काम आगे भी करते जाना!
सीख हमको दे गयी नानी, होकर चंद चूहे भी,
बिल्लियों से लड़ते जाना ! !

दो स्वरुप !


कहीं पीपल, कहीं अमिया
कहीं छ्छपर  का सीधा सदा गाँव
कहीं पसीने से तर -बतर  तन !
कहीं AC  में बैठक सियासत के दांव  ! !

                                                            कहीं कोई चेहरा देता है राहों को ,
                                                           उसकी छालों से हरी हो चुकी पांव !
                                                           कहीं मुखौटो पे मुखौटा चढ़ाये
                                                           पूछता, मै कौन? बताओ ! !

कहीं खेतीं नावे, ढोती सवारी !
लहरों को चीरती अकेली पतवार ! !
कहीं किनारे से लाकर डुबोती !
ऐसी भी,  है सूखी मझधार ! !

                                                             कहीं अंधेपन में धसती
                                                             लुटती हुई अधिकार!
                                                             कहीं कर्तव्यों से मुह मोड़ती,
                                                             अपना ही करती दुर्व्यवहार ! !

कहीं अश्रु से सिंचित,
तृप्ति की दिखाती प्रतिरूप !
कहीं सबकुछ करती स्वाहा
अतृप्त पिपाशा की अनल कूप ! !

                                                             क्यों कुत्सित, कलंकित
                                                             दरिद्र नग्नता सी कुरूप !!
                                                             फिर भी अलंकृत, विलासित
                                                              पापिष्ठ पापात्माओ  का स्वरुप !!