रविवार, 29 जुलाई 2018

दुर्गति

सन २०३७, मैं हूँ एक बेटी का बाप।
सौभाग्य समझता था जिसे, वो बना संताप !!
इंग्लिश की गालियां ज़ुबान पर, मातृभाषा नहीं बोलती है !
संस्कार गया तेल लेने , उसकी सड़कों पे कार बोलती है !!

सिगरेट का कश, धूवाँ मेरे चेहरे पर उड़ाना फैशन है !
हर रोज़ नए छोकरों का उसको अट्रैक्शन है !!
हम डाटें, कहें सम्हालो खुद को, सोचो ज़िन्दगी में क्या करना है?
कहती है जो करती हूँ  ट्रेनिंग है, मुझको पोर्नस्टार बनना है !!

गुस्सा बहुत आया था , मैंने उसपर हाथ उठाया था !
क्या हमारी संस्कृति, क्या हमारी उपलब्धि उसको समझाया था
फिर , तनहा अकेले, मैं सोचने लगा, ये हमारा ही तो कसूर है !
हमने ही तो लौंडिया बाज़ "बाबा" और वेश्या सन्नी को किया मशहूर है !!

हमको तै करना था, किसको आदर्श बना कर समाज में पेश करें।
पोर्नस्टार की जीवनी फील्म बने तो, संस्कारों के पक्ष में केस करें !!
प्रश्न करें, जीवनी बनानी है तो श्री कलाम, सुश्री कल्पना क्यों नहीं दिखती है ?
आखिर संजू और सन्नी से प्रेरणा ले, आनेवाली पीढ़ी क्या सीखती है ?


गुरुवार, 5 जुलाई 2018

दशक ९० का !

अभी उपभोगता वाद की होड़ ना थी,
टीवी बस दूरदर्शन था, न्यूज़ चैनलस की शोर ना थी 
बड़े जतन से लिखे जाते थे खत, पड़ोसन चची का तोफा अचार मुरब्बे का। 
आज अकेलेपन की यादों में सोचू , क्या दशक था वो ९० का। 

 लोग कितने भोले थे और शरारत थी मचलती आखों में। 
मोबाईल स्क्रीन के कैदी ना थे, शाम जुज़ारती थी बरगद की शाखों पे। 
एक गुलाब और एक प्रेम पत्र, लाइब्रेरी की किताब में दबाये, गवाह जज़्बे का। 
ब्रेकअप , पैचअप  का खेल नहीं था , संवेदना सार थीं दशक ९० का। 

 काश्मीरी पंडितों के आँसू , दूर कहीं सिसकियाँ लेती रही, 
देश की टूटती आशाओं का भार , सचिन का बल्ला ढोती रही। 
सानु , उदित  और अलका के गाने सुनाता, कैसेट की दूकान हर कसबे का। 
महानगरों की रैट रेस से दूर, गाओं की पगडण्डी में, मैं ढूंढ़ता हूँ वही दशक ९० का।

जाते जाते लाहौर को गई बस, कारगिल की वादियां सूर  कर गई,
ले गई साथ सुकून, वो एहसास जिसके आज होने को भी कसूर कह गई 
पिठ्ठू की जगह, अब वीडियो गेम्स लेने लगी थी, बिकने लगा था पका खाना डब्बे का। 
वैलेंटाइन और मैक्डोनाल्ड की दस्तक थी, किसी कोने पे धुल चाटता मिला , कनस्तर मुरब्बे  का।
संवेदनाएं मिटती गई , द्वेष इर्षा ने जगह ले ली , ज्यों ज्यों गुज़रा साल आखरी ९० का।