शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

मेरा सच

मैं कोइ कवी हूॅ ऐसा दावा नहीं करता!
मैं सर्वज्ञ होने का दिखावा नहिं करता !!
मेरी रचनाए संवेदनाओ का लिपांतरण है!
शोशक द्वारा भुलाई हुई अन्त:करण है !!

तालियों की शोर में गुम ना हो जाऊं कहीं !
शोहरतों के सुरूर में टुन्न ना हो जाऊं कहीं !
मेरा मकसद तेरे जूनून-ए-वतनपरस्ती से पूरा है।
वरना अल्फ़ाज़ सारे बेमायने है , अधूरा है !

कागज़ पे रिस्ता हुआ स्याही नहीं, है  मेरा लहू।
जो भी हैं, उमढ़ते जज़्बात, तुमसे नहीं तो किस्से कहूँ ?
तर्ज़ों में लिखी हो तो हरकोई, हर बयां को ख्वाब समझ  लेता है !~  
कोरी कल्पना समझ लेता है,  मामूली किताब समझ लेता है।