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मई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वर्णसंग्राम

एक समय था देश में, संघर्ष विवरणों से जारी था। अधिकार, अस्मिता, आत्मसम्मान उदय , लोभ, घृणा, द्वेष पर भारी था !! समए  बदला, निज़ाम भी ! अब वर्णो की अलग परिभाषा भी !! वर्णो में टकराव का वेग रहा फिर भी ! वर्णो में वर्गभेद मिटने की प्रत्याशा भी !! अब संघर्ष था नए लक्ष की खोज में , लोभ, घृणा, द्वेष पर नज़र की बारी है! वर्णाश्रम के खंडहारों को समेटकर , आरक्षण  झुनझुने से , बिगुल फूकने की तयारी है !! सघर्ष की ये  दिशाहीन लालसा ने वर्णो को गृहयुद्ध की कगार दे दिया ! मेरे घर की रौशनी तेरे घर से काम क्यों हो ? उपचार में, फूँक मारकर, वतन अन्धकार कर दिया !!

नोटा प्रधान तंत्र

ना कांग्रेस की जीत हुई ना भाजपा की हार हुई त्रिशंकु विधानसभाओं में कंज़ोर हर सरकार हुई वोट प्रतिशत कहते हैं। यहाँ नोटा वाले ज़ादा रहते है ! गणतंत्र में  साकार उसी की बने बहुमत से जनता जिसे चुने !! जब जनता की अदालत में जनादेश किसी ने नहीं पाया है ! इसलिए बहुमत में, अदृश्य प्रत्याशी नोटा जीत कर आया  है !! नोटा के विधायक, मंत्री मुख्यमंत्री कहा से लाओगे ? या गणतंत्र की हार मानकर राज्यपाल की सरकार चलाओगे ? ये गणित का तोड़ जोड़ है , सत्ता पाने की लिप्सा होड़ है ! क्या बहुमत से ये धोका नहीं है? सब मिले हुए है , किसी ने रोका नहीं है !! गणतरण के शर्त अनुसार नोटा की सरकार गढ़ो या संविधान पर पुनर्विचार सत्ता का बहिष्कार करो !!