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धर्म संकट

बाहर के आतंकी हो  या अंदर के दंगाई ! एक भाषा एक ही लक्ष  एक सी झंडों की रंगाई !! सिंघासन जो राजदंड का करे प्रहार  बुद्धिजीवी चींखे,  लूटा मानवाधिकार ! पहले किया निहत्था, फिर हुआ जनसंहार  सनातन को विधिवत जीने का मिलता उपहार !! नस्लों में विषैले विचार बोने वाले सम्मान निधि पा जीवन रहे गुज़ार।  अधर्म ग्रन्थ सीखाने वालों को, हम धर्मप्रचारक पुकार रहे।।  उनपे फ़र्ज़ है क़त्ल तुम्हारा, और  तुम चादर चढाने चले मज़ार।   यात्रा की शोभा है फूटा हुआ हिन्दू सर तुम ही पीड़ित, तुमपर ही धिक्कार !! व्यवस्था का आभाव है, या  शत्रु प्रायोजित अत्याचार ! तय करने में निष्फल तुम्हारी सत्ता नित्य विधि द्वारा भी छाला जाये अधिकार !!   शाकाहारी सिघों का जंगल  मुट्ठीभर वन-स्वानो से घिरे हुए। शांति की भिक्षा व्यर्थ, मिमिया के मांग रहे,   देकर धर्म-संकट की दुहाई, स्व नजरों से गिरे हुए।  

मेरे लिए काफी है , पर !

राम नाम की धुनि रमाकर  या, चिता भस्म से नाहाकर वळख्ळ या दिगंबर धर, वैरागी बन जाना सत्य की खोज, मेरे लिए काफी है, पर !  प्राचीन गुरुओं की वाणी सुन मैं भी लून, मोक्ष की राह चुन हाहाकार कोलाहल से दूर जाकर एकांत का प्रयास, मेरे लिए काफी है, पर !  निश्लीपत, व निष्क्रिय रहकर  आजीविका के लिए सब सहकर  संवेदनहीन हो जाऊं ज्यों प्रस्तर  मेरे लिए काफी है , पर ! कमर्फल एवं समयचक्र की सत्यता जानता हूँ ! धर्म जय को अधर्म का नाश आवश्यक मानता हूँ  ! मोक्ष जीवन  का लक्ष्य अंतिम , मेरे लिए काफी है , पर ! प्रतिकार ना करना, क्या चेतना को दे पायेगा वो स्तर ??