एक जंग मिली है जीने को ! ज़ख्म कई है सीने को ! न रोको इस रक्त को दो झड़ने ! ये जीवन है मेरा, मुझे दो लड़ने ! ! स्वार्थी धूर्त , घातक शोषक प्रतिपक्ष! मेरे नेत्र-बाण में , वे हि है लक्ष ! ! समक्ष मुखौटे, इनके गिरते हैं, दो गिरने ! यह मात्र आरम्भ है, प्रतिपक्ष से दो भिड़ने ! ! कुछ तो अंग मेरा भी कटेगा ! जीत उसी की जो अंत तक डटेगा ! ! ना रोको मुझे, उनका हर दाव आज़माना है ! विजय मिली तो सही, या फिर वीरगति ही पाना है ! ! मै मर गया तो ना समझना शेष रण है ! हर जन्म में लड़ने का मेरा प्रण है ! ! मैं न रहा तो, जो लड़ना चाहे उसे दो लड़ने! जीवन तो समर है, शान बस विजय या वीरगति वरन में ! !
मेरे लिखित कविताएँ और कहानियाँ जो मातृभूमि के लिए मेरी श्रद्धांजलि है और कुछ विचार हमेशा सोच में रखने के लिए!