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जनवरी, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

धुँआ छटा

एक जंग मिली है जीने को ! ज़ख्म कई है सीने को ! न रोको इस रक्त को दो झड़ने ! ये जीवन है मेरा, मुझे दो लड़ने !  ! स्वार्थी धूर्त , घातक शोषक प्रतिपक्ष! मेरे नेत्र-बाण में , वे हि है लक्ष ! ! समक्ष मुखौटे, इनके गिरते हैं, दो गिरने  ! यह मात्र आरम्भ है, प्रतिपक्ष से दो भिड़ने   !  ! कुछ तो अंग मेरा भी कटेगा ! जीत उसी की जो अंत तक डटेगा ! ! ना रोको मुझे, उनका हर दाव आज़माना है ! विजय मिली तो सही, या फिर वीरगति ही पाना है !  ! मै मर गया तो ना समझना शेष रण है ! हर जन्म में लड़ने का मेरा प्रण है !  ! मैं न रहा तो, जो लड़ना चाहे उसे दो लड़ने! जीवन तो समर है, शान बस विजय या वीरगति वरन में !  !

मंथन

एक तरफ लोभ का दानव ! एक तरफ संक्रमित मानव ! ! एक तरफ पीड़ित जन भी  ! एक तरफ मेरा व्यथित मन भी  ! ! निदान को तैयार हम  ! संचार,  महेंद्रगिरी  सा बना स्तम्भ !  ! पीठ कुम्भ सा दिए न्याय भी  ! जनता  हुई वसुखी का पर्याय भी ! ! अब मंथा   जायेगा समाज समुद्र सा ! उथलेगा सबकुछ, छुद्र अतिचुद्र सा ! ! स्वयं हलाहल हुआ है प्रकट ! जीवन पर घनघोर है संकट ! ! शिव कृपा को नेत्र तरसते है ! मेरे, सामर्थ  हीनता पे नेत्र बरसते है ! ! ये विष पान करने की  किस्मे है क्षमता ? देखना है, खुदको शिव रंग में कौन है रंगता ! !

आवाहन करो

विनती, स्तुति, विनय रख हारे ! शत्रु हमे नित् दिन संघारे !! अपनी सहनशीलता त्यागो, हिल्लोर उठाओ, निद्रा से जागो!! समय समर का पुकार रहा है ! कहकर कापुरुष हमे धिक्कार रहा है !! वर्चस्व की चेष्टा में कोई पग पसारता है ! अधर्म की स्थापना को, जग संघारता है !! द्वेषानल में ध्रिताहुती देता कोई ! हर मतभेद का, द्वन्द का सदुपयोग कर लेता कोई !! वो अपनों में रहकर, घर का भेदन करता है ! अपने ही सखा सम्बन्धियों का मस्तक छेदन करता है !! अब सीमा के पर गई क्रोध की ज्वाला ! अपमानित हुई अब तो, हरिवंश की मधुशाला !! रहो अब मूक दर्शक नहीं, शत्रु दहन करो ! समय आ गया रण चंडी का आवाहन करो !!