हे ! सुनो ग़ौर से बात मेरी क्यों पकड़े हुए हो, बन्दूक, गांजा, सिगरेट, बीड़ी ! जब युवा पूरे समाज का प्राणदाता है, क्यों अनपढ़, निकृष्ठ, स्वार्थी कोई, तुम्हारा भाग्य विधाता है !! तुम सत्ता की सीढ़ी बनकर रह जाते वो गद्दी चढ़ पीढ़ी दर पीढ़ी मेवा खाते! उत्तेजित कर देने वाले भाषण देकर, तुम्हारे जोश से नफा लेने को बहकाते कब तक ले कर जियोगे म् का डर! इस तरह हर सांस पे रहते हो मर !! जब जब यवा समाज डर जायगा तब तब मानवता की बढ़ती रहेगी मृत्यु दर !! तुम शक्ति ताकत स्फूर्ति के हो भण्डार! किस ब्रम्ह वर पर रावण करे अहंकार ? खुदको सीढ़ियों में तब्दील ना होने दीजिये अपनी सरज़मीं उनकी मेहफिल ना होने दीजिये अब अपने भाग्य के खुद बनो विधाता बनो ऐसा के समाज कर सके तुमपर अभिमान! मस्तक छेद करो स्वार्थ ,जिसने किये चोरी से सुधा पान समस्याएं मिटने का प्रयत्न करो, ना की उसमे योगदान !! मैं इस हेतु कार्यरत हूँ अपनी कलम से जितना समर्थ हूँ ! पर मेरा योगदान व्यर्थ है जो तुम ना जागे अब भी ग़र देशचेतना तुममें ना जागे ! दुष्टों से मुक्त सिंघासन तब तक नहीं होगा युवा जब...
मेरे लिखित कविताएँ और कहानियाँ जो मातृभूमि के लिए मेरी श्रद्धांजलि है और कुछ विचार हमेशा सोच में रखने के लिए!