रविवार, 28 नवंबर 2021

आखिर क्या चाहते हो?

 हुकुम तुम्हारी बजाने को, भक्ती में गुण गाने को! नर नारी सब एक करा दें ? प्रकृती के नियम भुला दें?


विद्यालय के नऐ नियम से,
खेल रहे क्यों संयम से?
उभयलिंगी छात्रो के शौचालय?
व्यभीचार के गढ़ बनाओगे विद्यालय ?

मानव के प्राकृतिक वृद्धी
को रोकोगे विष देकर?
जन रोश से बच लोगे
ऐसे निरंकुष निर्णय लेकर?

हमने चुना था तुमको
गुरूकुलों की पुनः स्थापना को।
इतीहास के पन्नो पे कुछ तो अपना हो?
तुमने तो भविष्य अंधकार से ग्रस्थ कर दिया।
इतीहास छोड़ो, वरतमान से त्रस्त कर दिया।

तुमको विक्रमादित्य के सिंहासन पर हमने भेजा,
जयचंद सरीखे तुम निकले, ये क्या हमने देखा?
मायने बदल गए है बस, कहते वही है लेकिन मुँह से
नेता तुम सरीखा हमने पहले कभी ना देखा।

तुमने सोचा, मेरा विक्लप कहा है।
सर पीटकर, रो रो कर, फिर लौटकर आना यहाँ है।
धनानन्द को चाणक्य का उतघोष सुना दूं !
सृष्टी प्रलय दोनो खेलते मेरी गोद में ये बतला दूं ।

नऐ सम्राटो का निर्माण भी हो सकता है।
बाराखम्बा पर फिर एक शीश लटका भी हो सकता है।
राष्ट्र बड़ा है, यहाँ ना कोई और बड़ा है, याद रहे।
जो दे सकता है सत्ता तुमको, वीवश नहीं वो खड़ा है याद रहे।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

टेम आ गया है।

खुद को जानने का,
दुविधा को हटाकर
भ्रांतिया सब घटाकर
सत्य को मन्ने का 

" टेम  आ गया है। "


                                                                            जिन पर हम हसते रहे
                                                                           हरबार उन्ही बातों से
                                                                           तिरस्कृत जज़्बातों से 
                                                                           घरशत्रु  हमे डसते रहे

                                                                           पर अब,  टेम  आ गया है। 

विदेशों में सम्मान मिले 
वो सनातन चाहे 
हम मने गहे बगाहे
 उसपर भी फरमान मिले। 

अब नहीं,  टेम  आ गया है। 


                                                                           भगवाकरण ? है, तो है। 
                                                                           वेदो से सीख, आचरण 
                                                                           धर्म हेतु म्रतियु वरण 
                                                                           कम्युनल ? है, तो है। 

                                                                            टेम  आ गया है। 


शुक्रवार, 19 मार्च 2021

कौन सही ? या मौन सही !


गूजर के राज का तेली,
भोज सिंहासन जा बैठा!!
जो मानस में जागे, वही ठीक! 
अपने ज़िद पर निर-अंकुश ऐठा!!

वैश्य वर्ण के चरण राज सत्ता! 
अर्थ धर्म को गौण कर रहा!! 
आरक्षण सुसज्जित, योग्यता पर बट्टा! 
क्षत्रीय रक्त शीतल,  मौन भर रहा!! 

सम्वेदनाए मगर के अश्रू हुए! 
राष्ट्र सारा बाज़ार कर दिया!! 
चंद गूजर के वैशयों का शासन! 
अर्थव्यवस्था का आधार कर दिया!!  

एक राज्य के अधीनस्त बाकी सारे 
गणतंत्र में साम्राज्यवाद का नया दौर हो गया!!  
हम गृहस्त के कार्यों में उलझे रहे। 
यहाँ राजनीती, अलीगढ से मंदसौर हो गया!! 

पालघर से लखीमपुर तक भटकता बलिदान यहाँ 
बाग़ कहीं शाहीन हुआ, कब्ज़ाबाज़ किसान हो गया। 
कश्मीर भी फिर बना बिहारियों का शमशान वहाँ। 
हिन्दू को बपौती समझ, चौकीदार बेईमान हो गया।

 विकल्प खोजते बन नहीं पड़ता,  न सूझे कौन सही।
 बस अपनो पे चलता है ज़ोर, दोश हमारे गौण सही। 
ध्वनी विरोध की न उपजे, अभिव्यक्ती मौन सही। 
समए हमसे पूछता, पूछें कौन सही, या मौन सही !