शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

मेरा सच

मैं कोइ कवी हूॅ ऐसा दावा नहीं करता!
मैं सर्वज्ञ होने का दिखावा नहीं करता !!
मेरी रचनाए संवेदनाओ का लिपांतरण है!
शोशक द्वारा भुलाई हुई अन्त:करण है !!

तालियों की शोर में गुम ना हो जाऊं कहीं !
शोहरतों के सुरूर में टुन्न ना हो जाऊं कहीं !
मेरा मकसद तेरे जूनून-ए-वतनपरस्ती से पूरा है।
वरना अल्फ़ाज़ सारे बेमायने है , अधूरा है !

कागज़ पे रिस्ता हुआ स्याही नहीं, है  मेरा लहू।
जो भी हैं, उमढ़ते जज़्बात, तुमसे नहीं तो किस्से कहूँ ?
तर्ज़ों में लिखी हो तो हरकोई, हर बयां को ख्वाब समझ  लेता है !~  
कोरी कल्पना समझ लेता है,  मामूली किताब समझ लेता है। 

रविवार, 29 जुलाई 2018

दुर्गति

सन २०३७, मैं हूँ एक बेटी का बाप।
सौभाग्य समझता था जिसे, वो बना संताप !!
इंग्लिश की गालियां ज़ुबान पर, मातृभाषा नहीं बोलती है !
संस्कार गया तेल लेने , उसकी सड़कों पे कार बोलती है !!

सिगरेट का कश, धूवाँ मेरे चेहरे पर उड़ाना फैशन है !
हर रोज़ नए छोकरों का उसको अट्रैक्शन है !!
हम डाटें, कहें सम्हालो खुद को, सोचो ज़िन्दगी में क्या करना है?
कहती है जो करती हूँ  ट्रेनिंग है, मुझको पोर्नस्टार बनना है !!

गुस्सा बहुत आया था , मैंने उसपर हाथ उठाया था !
क्या हमारी संस्कृति, क्या हमारी उपलब्धि उसको समझाया था
फिर , तनहा अकेले, मैं सोचने लगा, ये हमारा ही तो कसूर है !
हमने ही तो लौंडिया बाज़ "बाबा" और वेश्या सन्नी को किया मशहूर है !!

हमको तै करना था, किसको आदर्श बना कर समाज में पेश करें।
पोर्नस्टार की जीवनी फील्म बने तो, संस्कारों के पक्ष में केस करें !!
प्रश्न करें, जीवनी बनानी है तो श्री कलाम, सुश्री कल्पना क्यों नहीं दिखती है ?
आखिर संजू और सन्नी से प्रेरणा ले, आनेवाली पीढ़ी क्या सीखती है ?


गुरुवार, 5 जुलाई 2018

दशक ९० का !

अभी उपभोगता वाद की होड़ ना थी,
टीवी बस दूरदर्शन था, न्यूज़ चैनलस की शोर ना थी 
बड़े जतन से लिखे जाते थे खत, पड़ोसन चची का तोफा अचार मुरब्बे का। 
आज अकेलेपन की यादों में सोचू , क्या दशक था वो ९० का। 

 लोग कितने भोले थे और शरारत थी मचलती आखों में। 
मोबाईल स्क्रीन के कैदी ना थे, शाम जुज़ारती थी बरगद की शाखों पे। 
एक गुलाब और एक प्रेम पत्र, लाइब्रेरी की किताब में दबाये, गवाह जज़्बे का। 
ब्रेकअप , पैचअप  का खेल नहीं था , संवेदना सार थीं दशक ९० का। 

 काश्मीरी पंडितों के आँसू , दूर कहीं सिसकियाँ लेती रही, 
देश की टूटती आशाओं का भार , सचिन का बल्ला ढोती रही। 
सानु , उदित  और अलका के गाने सुनाता, कैसेट की दूकान हर कसबे का। 
महानगरों की रैट रेस से दूर, गाओं की पगडण्डी में, मैं ढूंढ़ता हूँ वही दशक ९० का।

जाते जाते लाहौर को गई बस, कारगिल की वादियां सूर  कर गई,
ले गई साथ सुकून, वो एहसास जिसके आज होने को भी कसूर कह गई 
पिठ्ठू की जगह, अब वीडियो गेम्स लेने लगी थी, बिकने लगा था पका खाना डब्बे का। 
वैलेंटाइन और मैक्डोनाल्ड की दस्तक थी, किसी कोने पे धुल चाटता मिला , कनस्तर मुरब्बे  का।
संवेदनाएं मिटती गई , द्वेष इर्षा ने जगह ले ली , ज्यों ज्यों गुज़रा साल आखरी ९० का। 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

अनुबंधित (contracted)

अगर हाथ से मिले हाथ
तो, मिलाते चलो जज़्बात।
व्यक्ति से व्यक्ति जुड़ें, व्यक्ति से समाज,
समाज से फिर राष्ट्र जुड़ें, ये पुरखों की सौगात।

मुझसे पहले आप आओ, आपसे पहले परिवार
परिवार से पहले समाज आये, उससे भी आगे देश
जीवन के हर फैसले में, इस क्रम को जारी रखें
मैं को अंतिम में जगह मिले, अगर रहे कुछ शेष।

संस्कृती के आदान प्रदान से
कभी भी रहा हमको बैर नहीं
उड़ने को पर मिलने पर,
महत्व कभी खोते पैर नहीं।

उठे सवाल अपनी परम्पराओं पर
बेशक उसकी जांच करो।
पर उद्देश्य क्या गैरों की इसमें
उसकी भी तो आंच करो।

यही भर भर उठाली तुमने
अंध भक्ति से जिनके जीवन मूल्य।
क्या विवेक तराज़ू में तौल के देखा
क्या है वो ग्रहण योग्य या समतुल्य?

वो समाज, संपर्क और संसाधनों को
एक मात्र अनुबंधों से जुड़ा हुआ मानते है।
अनुबंध विच्छेद अपराध से दंड का भय
इसको पारस्परिक सम्मान से ऊचा मानते है।


आतंक का सरमाया चहुँ ओर है और
कारन यही की सम्मान कहीं दीखता नहीं।
 भ्रष्टाचार नित्य जीवन शैली है मनुज की,
अनुबंधों की इस व्यवस्था में क्या बिकता नहीं।?

मैं अनुबंधित हूँ संविधान से, सो मतदान है,
वरना सच बताओ, गणतंत्र का सम्मान है ?
मैं अनुबंधित हूँ  नगरपालिका से, सो वास है,
नामांकित है जन्म, वरना क्या पहचान है ?

मेरा आधार मेरी संस्कृति से है,
नाकि सरकार से जारी किसी कार्ड से?
मै आर्य हूँ , आर्यावर्त से, यूँ जाना जाऊं
या कीस  घर, किस मुहल्ला, किस वार्ड से।