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दशक ९० का !

अभी उपभोगता वाद की होड़ ना थी,
टीवी बस दूरदर्शन था, न्यूज़ चैनलस की शोर ना थी 
बड़े जतन से लिखे जाते थे खत, पड़ोसन चची का तोफा अचार मुरब्बे का। 
आज अकेलेपन की यादों में सोचू , क्या दशक था वो ९० का। 

 लोग कितने भोले थे और शरारत थी मचलती आखों में। 
मोबाईल स्क्रीन के कैदी ना थे, शाम जुज़ारती थी बरगद की शाखों पे। 
एक गुलाब और एक प्रेम पत्र, लाइब्रेरी की किताब में दबाये, गवाह जज़्बे का। 
ब्रेकअप , पैचअप  का खेल नहीं था , संवेदना सार थीं दशक ९० का। 

 काश्मीरी पंडितों के आँसू , दूर कहीं सिसकियाँ लेती रही, 
देश की टूटती आशाओं का भार , सचिन का बल्ला ढोती रही। 
सानु , उदित  और अलका के गाने सुनाता, कैसेट की दूकान हर कसबे का। 
महानगरों की रैट रेस से दूर, गाओं की पगडण्डी में, मैं ढूंढ़ता हूँ वही दशक ९० का।

जाते जाते लाहौर को गई बस, कारगिल की वादियां सूर  कर गई,
ले गई साथ सुकून, वो एहसास जिसके आज होने को भी कसूर कह गई 
पिठ्ठू की जगह, अब वीडियो गेम्स लेने लगी थी, बिकने लगा था पका खाना डब्बे का। 
वैलेंटाइन और मैक्डोनाल्ड की दस्तक थी, किसी कोने पे धुल चाटता मिला , कनस्तर मुरब्बे  का।
संवेदनाएं मिटती गई , द्वेष इर्षा ने जगह ले ली , ज्यों ज्यों गुज़रा साल आखरी ९० का। 

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