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दुर्गति

सन २०३७, मैं हूँ एक बेटी का बाप।
सौभाग्य समझता था जिसे, वो बना संताप !!
इंग्लिश की गालियां ज़ुबान पर, मातृभाषा नहीं बोलती है !
संस्कार गया तेल लेने , उसकी सड़कों पे कार बोलती है !!

सिगरेट का कश, धूवाँ मेरे चेहरे पर उड़ाना फैशन है !
हर रोज़ नए छोकरों का उसको अट्रैक्शन है !!
हम डाटें, कहें सम्हालो खुद को, सोचो ज़िन्दगी में क्या करना है?
कहती है जो करती हूँ  ट्रेनिंग है, मुझको पोर्नस्टार बनना है !!

गुस्सा बहुत आया था , मैंने उसपर हाथ उठाया था !
क्या हमारी संस्कृति, क्या हमारी उपलब्धि उसको समझाया था
फिर , तनहा अकेले, मैं सोचने लगा, ये हमारा ही तो कसूर है !
हमने ही तो लौंडिया बाज़ "बाबा" और वेश्या सन्नी को किया मशहूर है !!

हमको तै करना था, किसको आदर्श बना कर समाज में पेश करें।
पोर्नस्टार की जीवनी फील्म बने तो, संस्कारों के पक्ष में केस करें !!
प्रश्न करें, जीवनी बनानी है तो श्री कलाम, सुश्री कल्पना क्यों नहीं दिखती है ?
आखिर संजू और सन्नी से प्रेरणा ले, आनेवाली पीढ़ी क्या सीखती है ?


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युद्ध घोष

नूह, नागपुर, मुर्शिदाबाद, पुलवामा हो या पहलगाम ! कुछ अंतर नहीं है इनमे,  सब अल जिहाद के घाव तमाम !! भत्सनाओं का समय निकल गया, अबतो शुरू करो इनको मिटाना ! और इनके जो है सारे सहकारी बुलडोज़र तले हो इनका ठिकाना !!  विक्सित भारत है स्वप्न तुम्हारा गज़वा -ए - हिन्द उनको चाहिए ! सिमी, प.फ.आई , आई. एम बनाने  मिलते है कहाँ से जो लोग चाहिए ?  वो जो है, उनको वही कहना सीखो मिमयाना छोडो, अब शेर बनकर जीना है।   अल जिहाद से युद्ध की हो चुकी घोषणा अब भिड़ाकर देखेंगे बारूदों से फौलादी सीना !! जन्नत के परवानो से लड़ना है तुमको जानो, इस युद्ध के है आयाम कई! शोणित से लाल होगी गलियां सभी चुकाने पड़ेंगे हमको भी दाम कई ! इस युद्ध को परिणाम देने, जिहाद के निर्गत तक जाना होगा ! संक्रमन सफाई प्रयाप्त नहीं, उद्गम तक जाकर, समाधान का अभियंता बन जाना होगा।  अब इस रण में, जो भी विघ्न बनेगा गांडीव से शर उस ओर भी जाएगा। गंगा-जमुनी तहजीब का चूरन, जिसने अब चखाया, वो पछताएगा।   

Flaud Teri Shiksha Neeti

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द्विचर

दो नाव पर पांव डार जलधी पार जाने का विचार उसपर उल्टे पतवार, मूर्खता कहलाती है । हमको इसकी सलाह क्यों दी जाती है ?  क्यारियों में अलग अलग फूल, अच्छे है। बीच में कुछ शूल भरे खार पतवार के गुच्छे है। इनको अगर मैं उखाड़ दूं, ग़लत क्या है ? आखिर, वन और उपवन में भेद से गफलत क्या है? आलोक का ना होना ही तो तम है  इनमें समन्वय होना बस एक भ्रम है, इस भ्रम को जीवन शैली का आधार बनाना अराजकता की ओर धकेलने का है बहाना !!  समय भस्म के कब्रों में कर्म छुपा ना पाओगे। अपने अक्स से सामना होगा, शर्म छुपा ना पाओगे !! ये वैश्विक होने का , टूट चुका है भंगुर ताशघर  । अपनी चाल भूल चुके, नकल उतार तुम बने द्विचर !!