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हिन्द की रूह !

जैसे डूबता हुआ सूरज,

आसमान में लालीमा भर देता है।

बुझते हुए दीपक भी अपनी,

आभा से घर रौशन कर देता है।


ठीक उसी तरह जागती हुई हिन्द की रूह,

हर आवाज़ नारों में तबदील अब।

हर तरफ़ लोगों का हुजूम शामिल सब,

टूटने से पहले उसकी आँखें खुली तब।


जैसे झूठ का पर्दाफाश हुआ,

उम्मीदें टूटी, ऐतबार घटा।

गुस्सा उसकी भीड़ सा बना दिया,

मासूमों का जुर्मवालों पर हिसाब बना।


दिशाएँ नहीं दी गई, तब भी ताकत जहर है।

हर किसी पर ये अज़ाब, कहर है।

इस भट्टी में तप कर ही निखारना होगा,

अंकुरित होना है? बीज बन बिखरना होगा।


वक़्त ऐसे ही दौर से गुज़र कर बदलता है।

कुछ नया बनने से पहले, हर शय जलता है।

टूटते हैं ऊँचे दरख्त, तिनकों से चमन बनता है,

जैसे हर बार टूटता है हिन्द, फिर नया वतन बनता है।

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युद्ध घोष

नूह, नागपुर, मुर्शिदाबाद, पुलवामा हो या पहलगाम ! कुछ अंतर नहीं है इनमे,  सब अल जिहाद के घाव तमाम !! भत्सनाओं का समय निकल गया, अबतो शुरू करो इनको मिटाना ! और इनके जो है सारे सहकारी बुलडोज़र तले हो इनका ठिकाना !!  विक्सित भारत है स्वप्न तुम्हारा गज़वा -ए - हिन्द उनको चाहिए ! सिमी, प.फ.आई , आई. एम बनाने  मिलते है कहाँ से जो लोग चाहिए ?  वो जो है, उनको वही कहना सीखो मिमयाना छोडो, अब शेर बनकर जीना है।   अल जिहाद से युद्ध की हो चुकी घोषणा अब भिड़ाकर देखेंगे बारूदों से फौलादी सीना !! जन्नत के परवानो से लड़ना है तुमको जानो, इस युद्ध के है आयाम कई! शोणित से लाल होगी गलियां सभी चुकाने पड़ेंगे हमको भी दाम कई ! इस युद्ध को परिणाम देने, जिहाद के निर्गत तक जाना होगा ! संक्रमन सफाई प्रयाप्त नहीं, उद्गम तक जाकर, समाधान का अभियंता बन जाना होगा।  अब इस रण में, जो भी विघ्न बनेगा गांडीव से शर उस ओर भी जाएगा। गंगा-जमुनी तहजीब का चूरन, जिसने अब चखाया, वो पछताएगा।   

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द्विचर

दो नाव पर पांव डार जलधी पार जाने का विचार उसपर उल्टे पतवार, मूर्खता कहलाती है । हमको इसकी सलाह क्यों दी जाती है ?  क्यारियों में अलग अलग फूल, अच्छे है। बीच में कुछ शूल भरे खार पतवार के गुच्छे है। इनको अगर मैं उखाड़ दूं, ग़लत क्या है ? आखिर, वन और उपवन में भेद से गफलत क्या है? आलोक का ना होना ही तो तम है  इनमें समन्वय होना बस एक भ्रम है, इस भ्रम को जीवन शैली का आधार बनाना अराजकता की ओर धकेलने का है बहाना !!  समय भस्म के कब्रों में कर्म छुपा ना पाओगे। अपने अक्स से सामना होगा, शर्म छुपा ना पाओगे !! ये वैश्विक होने का , टूट चुका है भंगुर ताशघर  । अपनी चाल भूल चुके, नकल उतार तुम बने द्विचर !!