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सवाल (शहीद के पिता की ओर से )

लिपटकर तिरंगे में वो आया
घर लौटने का उसने वादा निभाया।
बोझ काँधे पर है, गर्व से फूला सीना है।
आँखें नम है, आख़िर इसी नमी के साथ जीना है।


ख़बरें आम हैं, पड़ोसी ने सीज़फायर तोड़ा
उसने हमारे ५ मारे हमने मारे २०, नहीं छोड़ा।
सन ४८ से अब तक, गोलियाँ चलनी बंद हुई कब?
वो तोड़ता है जिसे हर रोज़ जो, वो सीज़फायर था कब?


हर साल दिवाली की मिठाई,
हर रमज़ान बाद, उन्हें ईद की बधाई,
व्यापार बढ़ाने को, अमन की आशा,
जुए में बैठ शकुनी से सदाचार की प्रत्याशा।

ये देशभक्ति के पीठ पर राजनीती के खंजर,
भाई- पड़ोसी बन बैठे है, कल के लूटेरे कंजर।
हासिल कुछ भी ना करने दिया, महिमा मंडित व्यर्थ हुए बलिदान।
धन्यवाद् में सर पे पत्थर, और बलात्कारी बताकर सम्मान।

ये सरहद भी चुनावी मुद्दा है, तभी तो अब तक ज़िंदा है!
तक्षशिला, हड्डपा से हिंलाज गवाकर, हम बस अयोध्या से शर्मिंदा है।
सूनी कोख़, बिछड़ी राखी, टी.र.पी की धनी पूछ रही, यही अमन का हाल है!
अमन नहीं, जंग नहीं तो क्या है ये? मेरी बूढ़ि कन्धों का यहि सवाल है !



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युद्ध घोष

नूह, नागपुर, मुर्शिदाबाद, पुलवामा हो या पहलगाम ! कुछ अंतर नहीं है इनमे,  सब अल जिहाद के घाव तमाम !! भत्सनाओं का समय निकल गया, अबतो शुरू करो इनको मिटाना ! और इनके जो है सारे सहकारी बुलडोज़र तले हो इनका ठिकाना !!  विक्सित भारत है स्वप्न तुम्हारा गज़वा -ए - हिन्द उनको चाहिए ! सिमी, प.फ.आई , आई. एम बनाने  मिलते है कहाँ से जो लोग चाहिए ?  वो जो है, उनको वही कहना सीखो मिमयाना छोडो, अब शेर बनकर जीना है।   अल जिहाद से युद्ध की हो चुकी घोषणा अब भिड़ाकर देखेंगे बारूदों से फौलादी सीना !! जन्नत के परवानो से लड़ना है तुमको जानो, इस युद्ध के है आयाम कई! शोणित से लाल होगी गलियां सभी चुकाने पड़ेंगे हमको भी दाम कई ! इस युद्ध को परिणाम देने, जिहाद के निर्गत तक जाना होगा ! संक्रमन सफाई प्रयाप्त नहीं, उद्गम तक जाकर, समाधान का अभियंता बन जाना होगा।  अब इस रण में, जो भी विघ्न बनेगा गांडीव से शर उस ओर भी जाएगा। गंगा-जमुनी तहजीब का चूरन, जिसने अब चखाया, वो पछताएगा।   

Flaud Teri Shiksha Neeti

कहां आर्यभट्ट, कहां ऋषी कणाद ? कहां ब्रम्हगुप्त, कहां मुनी अगस्त? ग्रैजुएट, मास्टरस कितने पढ़े लिखे एक मैथ्स की प्रौबलेम, सबको दस्त!  ज़िरो दिया हमने, दिया दशम्ळव, लगे रट्टा मार, मरे साईंस का लव! त्रीकोणमिती देने वाले, थीटा पाई से डर गए! लगा कैलकुलेटर हाथ, बंदे बिगड़ गए!! फ्लौड (3) , तेरी शिक्षा नीती !  कहीं अच्छी थी अपनी, दिक्षा नीती !! परमार का पता है, न मुक्तपीड़ का पता!  शुश, पता न चले सोहेलदेव की कथा !! भर भर के झूठ, ईतीहास के नाम परोसते रऔ!  लालची लुटेरे पुर्वज सोच सोच कोसते रऔ ! विद्या ददाती विनयम् , विनए ददाती  पात्रताम् ! पंद्रह से सत्रह साल की पढ़ाई, मै निकला बेशरम !! 190 साल की लड़ाई, कोट पैंट टाई में गवाई ! संघर्ष ६१० साल का निरंतर, हमको नहीं पढाई ?  फ्लौड (3) , तेरी शिक्षा नीती !  कहीं अच्छी थी अपनी, दिक्षा नीती !! १२ साल की स्कूलिंग, ५ साल की इंजीनियरिंग हम सब सारे हुक्म के गुलाम, बजट फेयरिंग !!  

द्विचर

दो नाव पर पांव डार जलधी पार जाने का विचार उसपर उल्टे पतवार, मूर्खता कहलाती है । हमको इसकी सलाह क्यों दी जाती है ?  क्यारियों में अलग अलग फूल, अच्छे है। बीच में कुछ शूल भरे खार पतवार के गुच्छे है। इनको अगर मैं उखाड़ दूं, ग़लत क्या है ? आखिर, वन और उपवन में भेद से गफलत क्या है? आलोक का ना होना ही तो तम है  इनमें समन्वय होना बस एक भ्रम है, इस भ्रम को जीवन शैली का आधार बनाना अराजकता की ओर धकेलने का है बहाना !!  समय भस्म के कब्रों में कर्म छुपा ना पाओगे। अपने अक्स से सामना होगा, शर्म छुपा ना पाओगे !! ये वैश्विक होने का , टूट चुका है भंगुर ताशघर  । अपनी चाल भूल चुके, नकल उतार तुम बने द्विचर !!